कांकेर, छत्तीसगढ़ रियासतकालीन परंपरा से जुड़ा कांकेर का ऐतिहासिक मेला 4 जनवरी को पूरे उत्साह और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ शुरू हुआ। सन् 1853 में कांकेर रियासत के राजा नरहरदेव द्वारा आरंभ किए गए इस मेले की परंपरा आज भी निरंतर निभाई जा रही है। देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना के साथ शुरू होने वाला यह आयोजन स्थानीय जनजीवन के साथ-साथ दूर-दराज़ से आने वाले सैलानियों को भी आकर्षित करता है।
धूमधाम से हुआ शुभारंभ, शोभायात्रा ने बांधा समां
मेले के शुभारंभ अवसर पर सांसद भोजराज नाग की उपस्थिति रही। उन्होंने कहा कि बस्तर अंचल में देवी-देवताओं के साथ मेले की शुरुआत करना प्राचीन परंपरा है, जो आज भी पूरी श्रद्धा से निभाई जा रही है। राजमहल से देवी-देवताओं के साथ भव्य शोभायात्रा निकली, जो मेलाभाठा मैदान पहुंची। यहां परंपरानुसार खंभे की परिक्रमा कर मेले की विधिवत शुरुआत की गई। पूरे आयोजन का संचालन राजकुमार आदित्य प्रताप देव के निर्देशन में किया गया।
राजमहल में एकत्र हुए देवी-देवता
राजकुमार आदित्य प्रताप देव ने बताया कि हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी विभिन्न ग्रामों के देवी-देवता राजमहल पहुंचे। उनका विधिवत स्वागत कर उन्हें मेला स्थल ले जाया गया, जहां क्षेत्र की सुख-समृद्धि और खुशहाली के लिए प्रार्थना की गई। यह परंपरा कांकेर की सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करती है।
देश-विदेश के सैलानियों का आकर्षण
कांकेर का यह मेला केवल स्थानीय आयोजन नहीं, बल्कि देश-विदेश के पर्यटकों के लिए भी आकर्षण का केंद्र है। पर्यटकों के ठहरने की व्यवस्था राजमहल के कॉटेजों में की जाती है। इस वर्ष भी विदेशी सैलानियों ने बस्तर की लोकसंस्कृति, परंपराओं और त्योहारों को देखकर खुशी जाहिर की।
दो सौ वर्षों से अधिक पुराना इतिहास
कांकेर मेला 200 वर्ष से अधिक पुराना माना जाता है। राजा नरहरदेव के शासनकाल (1853–1903) में शुरू हुआ यह मेला फसल कटाई के बाद, वर्ष के पहले रविवार को आयोजित किया जाता है। किसान अपनी उपज बेचकर मेले में खरीदारी करते हैं और उत्सव का आनंद लेते हैं। इस दौरान कांकेर शहर की सात शीतला माताओं सहित सैकड़ों देवी-देवताओं की उपस्थिति रहती है। भंडारीपारा, शीतलापारा, माहुरबंदपारा, टिकरापारा और अन्नपूर्णापारा के लोग मोखला मांझी का ध्वज और आंगादेव लेकर राजमहल पहुंचते हैं और परंपरा का निर्वहन करते हैं।
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